भारतीय क्रिकेट के इतिहास में कुछ ऐसे खिलाड़ी हुए हैं, जिन्होंने अपने खेल और नेतृत्व से ऐसी पहचान बनाई, जिसे आज भी याद किया जाता है। इन्हीं दिग्गजों में एक नाम है सी.के. नायडू का। पूरा नाम कोट्टारी कनकैया नायडू था। उन्हें भारतीय क्रिकेट का पहला टेस्ट कप्तान होने का गौरव हासिल है। खास बात यह है कि उन्होंने 36 साल की उम्र में भारतीय टीम के लिए टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण किया था। उस दौर में जब भारत अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहा था, तब नायडू ने अपनी बल्लेबाजी और आक्रामक अंदाज से दुनिया का ध्यान खींचा।
सी.के. नायडू का जन्म 31 अक्टूबर 1895 को नागपुर में हुआ था। क्रिकेट के प्रति उनका जुनून बचपन से ही था। उन्होंने 1916 में हिंदू टीम की ओर से प्रथम श्रेणी क्रिकेट में पदार्पण किया। शुरुआती दौर में ही उनकी बल्लेबाजी ने क्रिकेट प्रेमियों और विशेषज्ञों का ध्यान आकर्षित किया। वह दाएं हाथ के आक्रामक बल्लेबाज थे और गेंद को मैदान के बाहर पहुंचाने की अद्भुत क्षमता रखते थे। साल 1926 में मुंबई के बॉम्बे जिमखाना मैदान पर इंग्लैंड की एमसीसी टीम के खिलाफ उन्होंने महज 116 मिनट में 153 रन की तूफानी पारी खेली। इस पारी में उनके कई शानदार छक्के शामिल थे। उनके प्रदर्शन ने अंग्रेज क्रिकेट अधिकारियों को भारतीय क्रिकेट की क्षमता पर गंभीरता से विचार करने के लिए प्रेरित किया
नायडू की बल्लेबाजी से जुड़ा एक किस्सा आज भी क्रिकेट इतिहास में बेहद दिलचस्प माना जाता है। साल 1932 में भारत के इंग्लैंड दौरे के दौरान बर्मिंघम के एजबेस्टन मैदान पर वारविकशायर के खिलाफ एक मुकाबला खेला गया। इस मैच में नायडू ने 162 रन की शानदार पारी खेली। उनकी इस पारी में छह छक्के शामिल थे। इनमें से एक छक्का इतना लंबा था कि गेंद मैदान की सीमा पार करते हुए रिवर री नदी के पार पहुंच गई। उस समय यह नदी वारविकशायर और वॉर्सेस्टरशायर काउंटी के बीच प्राकृतिक सीमा मानी जाती थी। यानी नायडू ने एक ही शॉट में गेंद को एक काउंटी से दूसरी काउंटी तक पहुंचा दिया। कुछ विवरणों में गेंद के नदी में गिरने का भी जिक्र मिलता है, हालांकि इस बात की पुष्टि को लेकर अलग-अलग विवरण हैं







