राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने भारत की एकता, अखंडता और सामाजिक समरसता को लेकर महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने कहा कि देश में कुछ ऐसी बुरी ताकतें सक्रिय हैं, जो भारत को कमजोर करना और उसे विभाजित करना चाहती हैं। उनके अनुसार, भारत की प्रगति और उसकी मजबूत होती वैश्विक स्थिति के कारण कुछ शक्तियां देश की एकता को नुकसान पहुंचाने का प्रयास कर सकती हैं। भागवत ने इस संदर्भ में कहा कि केवल सत्ता परिवर्तन या रिजीम चेंज से किसी देश के हालात नहीं बदलते। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक मजबूती उसके समाज, नागरिकों के चरित्र, आपसी विश्वास और सांस्कृतिक मूल्यों पर निर्भर करती है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत को मजबूत बनाने के लिए समाज के प्रत्येक वर्ग को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। देश में जाति, भाषा, क्षेत्र और धर्म के आधार पर पैदा होने वाले मतभेदों को दूर करना समय की आवश्यकता है। जब समाज के लोग आपसी विवादों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को प्राथमिकता देंगे, तभी भारत अधिक सशक्त और आत्मनिर्भर बन सकेगा। भागवत के विचारों के अनुसार, किसी भी देश को कमजोर करने के लिए बाहरी दबाव के साथ-साथ आंतरिक मतभेदों का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इसलिए नागरिकों को ऐसी परिस्थितियों में सतर्क रहने और देश की एकता बनाए रखने की आवश्यकता है।
आरएसएस के विजयादशमी समारोह में नागपुर में संबोधित करते हुए भागवत ने फ्रांस, अल्बानिया, बांग्लादेश और नेपाल में हुए घटनाक्रमों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पश्चिम से ऐसी आंधी उठी है, जो सामाजिक व्यवस्था, सांस्कृतिक परंपराओं और मानवीय मूल्यों को नुकसान पहुंचाना चाहती है। भागवत के मुताबिक, दुनिया में कुछ शक्तियां अपने स्वार्थों को पूरा करने के लिए दूसरे देशों की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों को प्रभावित करने का प्रयास करती हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत की बढ़ती ताकत और प्रगति कुछ ऐसी शक्तियों के हितों के आड़े आ रही है, जिसके कारण देश को कमजोर करने की कोशिशें की जा रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ महत्वाकांक्षी नेता निजी सत्ता स्वार्थ और विवेक की कमी के चलते ऐसी गतिविधियों में सहयोग कर सकते हैं। हालांकि, भागवत ने लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन के महत्व को भी स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि समस्याएं पैदा होने पर आंदोलन होना स्वाभाविक है, लेकिन आंदोलनों का उद्देश्य समाधान निकालना होना चाहिए, न कि समाज में नफरत, वैमनस्य और विभाजन को बढ़ावा देना। उनके अनुसार, राजनीतिक विरोध केवल वोट हासिल करने या सस्ती लोकप्रियता पाने का माध्यम नहीं बनना चाहिए। किसी भी विवाद का हल संवाद, आपसी चर्चा और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के पालन से निकाला जाना चाहिए। उन्होंने समाज के लोगों से अपील की कि वे भ्रम फैलाने वाली गतिविधियों से सतर्क रहें और आपसी सद्भाव को बनाए रखें। भागवत ने भारत की विविधता को देश की ताकत बताते हुए कहा कि अलग-अलग पूजा पद्धतियों, भाषाओं और परंपराओं को अलगाव का कारण नहीं समझना चाहिए। भारत के प्रति भक्ति, पूर्वजों के प्रति गौरव और भारतीय संस्कृति के प्रति प्रतिबद्धता समाज को जोड़ने वाले महत्वपूर्ण सूत्र हैं। उन्होंने नागरिकों से व्यक्तिगत अहंकार और आपसी गलतफहमियों से ऊपर उठकर राष्ट्र निर्माण में योगदान देने का आह्वान किया। उनका कहना था कि भारत को विश्व में महत्वपूर्ण स्थान दिलाने के लिए समाज को संगठित, जागरूक और आत्मविश्वासी बनना होगा। भागवत के इस बयान को देश में सत्ता परिवर्तन और हालिया राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों को लेकर चल रही बहस के संदर्भ में देखा जा रहा है। उनके वक्तव्य ने राष्ट्रीय एकता, लोकतांत्रिक विरोध और बाहरी प्रभावों को लेकर राजनीतिक चर्चा को एक बार फिर तेज कर दिया है







