अब यह खेल दिमाग का नहीं, किस्मत का बन चुका है' - जब अजय देवगन का किरदार विजय सलगांवकर, पुलिस के साथ एक और तनावपूर्ण आमना-सामना होने के बाद अपने डरे-सहमे परिवार से यह कहता है, तो ऐसा लगता है जैसे दर्शक अपनी सांसें थामे हुए हैं।
एक आखिरी बार, विजय की बड़ी सावधानी से बनाई गई दुनिया खतरे में है। उसका केस सचमुच फिर से खोदकर निकाला गया है। सवाल सीधा-सा है- क्या वह एक आखिरी बार कानून से आगे रह पाएगा, या यह सलगांवकर परिवार के लिए सब कुछ खत्म होने का समय होगा?
'दृश्यम 3' में अजय देवगन, विजय सलगांवकर के रोल में लौट आए हैं और इस बेहद पसंद की गई फ़्रैंचाइज को एक आखिरी चैप्टर के साथ खत्म करने की कोशिश कर रहे हैं। फिल्म में वे सभी जानी-पहचानी चीजें हैं - पुलिस, परिवार, झूठ, सुराग और विजय की सबसे कई कदम आगे रहने की काबिलियत। लेकिन इस बार, केस को सुलझाने के लिए एक नया अफ़सर पूरी तरह तैयार है।
दृश्यम 3: कहानी
विजय और उसका परिवार गोवा में अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि वे बहुत कुछ झेल चुके हैं। लेकिन शांति ज्यादा समय तक नहीं रहती। पुराना केस फिर से सामने आता है, और इस बार, एक नया व्यक्ति सच का पता लगाने के लिए पूरी तरह तैयार है।
तब्बू का मीरा देशमुख वाला किरदार बदल गया है। वह अब वैसी सख्त अफसर नहीं रहीं जैसी दर्शकों ने पिछली फिल्मों में देखी थी। बेटे को खोने के बाद उनकी हिम्मत और जोश काफी कम हो गया है। अब वह मुख्य रूप से एक दुखी मां हैं, जो उस घटना का दर्द आज भी महसूस करती है।
तभी क्राइम ब्रांच के नए हेड के तौर पर राजीव सिंह तोमर (जयदीप अहलावत) की एंट्री होती है। वह खुद को विजय की जिंदगी में नया 'शनि' बताते हैं। अपने पहले के अफसरों के उलट, वह इस केस को यूं ही खत्म नहीं होने देना चाहते। वह पुरानी कब्रें खोदते हैं, DNA सबूत ढूंढते हैं
और पुराने जख्मों को फिर से कुरेदने के लिए इंस्पेक्टर गायतोंडे के साथ मिलकर काम करते हैं। यहीं से फिल्म का मुख्य सवाल सामने आता है। क्या विजय की किस्मत उसे एक बार फिर बचा पाएगी, या आखिरकार उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती आ गई है?
दृश्यम 3: कहानी और उसके कनेक्शन
इस फिल्म की एक अच्छी बात यह है कि इसे पता है कि दर्शक क्या सोच रहे हैं। दृश्यम 2 की तरह ही, यह फिल्म भी अपनी शुरुआत में दर्शकों को अब तक हुई सभी घटनाओं की याद दिलाती है। मेकर्स को उस साफ सवाल का भी अंदाजा है जो तीसरी फिल्म की घोषणा के साथ ही उठा था:
अब और क्या हो सकता है? फिल्म की कहानी किरदारों के जरिए ही इस उत्सुकता को शांत करती है। एक जगह गायतोंडे मजाकिया अंदाज में कहते हैं, 'इस केस की वजह से मेरी नौकरी जाती है और आती है।' यह बात असरदार लगती है क्योंकि दर्शक भी ठीक यही सोच रहे होते हैं।
कई ऐसे पल आते हैं जब किरदार सवाल उठाते हैं कि यह केस और कितना लंबा चलेगा। केस बंद होता है और फिर वापस शुरू हो जाता है। विजय बार-बार पुलिस को अपनी चालाकी से मात देता है। यह लगभग एक मजाक जैसा बन जाता है। और यहीं पर दृश्यम 3 पिछली फिल्मों की भावना से जुड़ी रहती है। इसे पता है कि दर्शक विजय को यह खेल आखिरी बार खेलते हुए देखने आए हैं।
दृश्यम 3: परफॉर्मेंस
अजय देवगन ने फिल्म में कमाल का काम किया है। विजय सलगांवकर के रोल में उन्हें लंबे डायलॉग या ड्रामैटिक अंदाज की जरूरत नहीं पड़ती। उनकी आंखें और उनकी खामोशी ही बहुत कुछ कह जाती है। विजय भले ही ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं है, लेकिन उसके पास दिमाग की कमी नहीं है। वह मुसीबत आने से पहले ही उसे भांप लेता है,
और यही काबिलियत हमेशा से उनकी सबसे बड़ी ताकत रही है। हर बार जब विजय पुलिस से एक कदम आगे रहता है, तो दर्शक भी रिएक्ट करते हैं। कभी हंसी, कभी टेंशन तो कभी राहत का एहसास होता है। फिल्म का पूरा दारोमदार अजय देवगन के कंधों पर है और देवगन ने विजय का किरदार एक बार फिर बखूबी निभाया है।
जयदीप अहलावत की कास्टिंग ने काफी एक्साइटमेंट पैदा कर दी थी। अहलावत और देवगन जैसे दो जबरदस्त एक्टर्स को आमने-सामने लाने से यादगार टकराव की उम्मीद थी। बदकिस्मती से, यहीं फिल्म अपनी राह भटक जाती है। फिल्म के पहले हिस्से में राजीव सिंह तोमर को एक ऐसे नए ऑफिसर के तौर पर पेश करने में काफी समय लगाया गया है जो आखिरकार सच का पता लगा सकता है। सच जानने के लिए वे सैम की आत्मा तक को बुला सकते हैं -
उनका गुस्सा ऐसा है। उन्हें लेकर दर्शकों में असली दिलचस्पी भी जगती है। लेकिन कहानी की राइटिंग उस उम्मीद पर खरी नहीं उतरती। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, उनका किरदार फीका लगने लगता है। यहाँ काफी गुंजाइश थी। इसके बजाय, बीच में ही किरदार का दम टूटता हुआ लगता है। जिस तरह से उन्हें इंट्रोड्यूस किया गया और जिस तरह से उनकी कहानी खत्म होती है, उससे राइटिंग और एडिटिंग पर भी सवाल उठते हैं। जयदीप ने जो कुछ भी उन्हें मिला, उसमें अपना बेस्ट दिया है; दुख की बात है कि राइटर की तरफ से यह चूक हो गई।
तब्बू का किरदार 'मीरा देशमुख' अब पहले जैसा नहीं रहा। उसने अपना इकलौता बेटा खो दिया है और उसके साथ ही, खुद का एक हिस्सा भी। इस बार उसका किरदार जांच-पड़ताल से ज़्यादा दुख और गम पर केंद्रित है। भले ही उनका रोल छोटा है, लेकिन जब भी वह स्क्रीन पर आती हैं,
तो सबका ध्यान अपनी ओर खींच लेती हैं। मीरा के पति 'महेश देशमुख' के तौर पर रजत कपूर को ज्यादा काम करने को मिला है। उनके किरदार के पास ज्यादा डायलॉग और पहल करने का मौका है, और वह सिर्फ एक सपोर्टिंग रोल जैसा नहीं लगता।
नंदिनी सलगांवकर के रोल में श्रिया सरन असरदार रही हैं। वह कोर्ट-कचहरी, पुलिस स्टेशन और सामान्य ज़िंदगी जीने के दबाव के बीच भी अपने परिवार को एकजुट रखने की कोशिश कर रही हैं। उन्होंने इस किरदार में भावनाओं की कोमलता को बहुत अच्छे से दिखाया है।
इशिता दत्ता ने भी अंजू के रोल में अच्छा काम किया है। उनका किरदार पिछली घटनाओं के असर से जूझ रहा है और दत्ता ने अपनी एक्टिंग में उस इमोशनल गहराई को बखूबी दिखाया है। मृणाल जाधव का रोल छोटा है, लेकिन कहानी के लिए अहम है।
और फिर आते हैं इंस्पेक्टर लक्ष्मीकांत गायतोंडे, जिनका रोल कमलेश सावंत ने निभाया है। वह अब भी ऐसे किरदार हैं जिनसे नफरत करने में भी मजा आता है।
विजय के साथ उनकी नोक-झोंक में काफी मजा आता है, और सावंत यह पक्का करते हैं कि हर बार जब वह स्क्रीन पर आएं, तो अपनी छाप छोड़ें। विजय के साथ उनकी केमिस्ट्री उन चीजों में से एक होगी जिन्हें फ़ैंस अब मिस करेंगे, क्योंकि यह फ़्रैंचाइजी अपने आखिरी चैप्टर तक पहुंच चुकी है।
प्रकाश राज ने तब्बू के बेटे की मौत के मामले में बचाव पक्ष के वकील के तौर पर दमदार रोल निभाया है और एक बार फिर साबित किया है कि वह कितने बेहतरीन एक्टर हैं। एक्टर में सबसे मुश्किल किरदारों में भी एक खास तरह का जोश और मज़ा लाने की अनोखी काबिलियत है। और यही खूबी वह इंद्रजीत शेट्टी के किरदार में भी लेकर आए हैं।
दृश्यम 3: निर्देशन
अभिषेक पाठक, जिन्होंने ज्यादातर समय प्रोड्यूसर के तौर पर काम किया है, उन्होंने दृश्यम 2 और 3 को को-राइट और डायरेक्ट किया है। वे दृश्यम की दुनिया को समझते हैं और कैमरा वर्क और फिल्म की रफ़्तार को काफ़ी हद तक कंट्रोल में रखते हैं। यह फिल्म सिर्फ़ एक और सीक्वल बनाने के लिए फ्रैंचाइजी को आगे बढ़ाने के बजाय, इसे एक आखिरी चैप्टर देने की सोची-समझी कोशिश लगती है। हालांकि, एडिटिंग और राइटिंग इसे थोड़ा कमजोर बनाती हैं। यह बात खासकर जयदीप अहलावत के किरदार में साफ़ दिखती है। कहानी जिस तरह से आगे बढ़ती है, उससे लगता है कि कुछ बहुत बड़ा होने वाला है, लेकिन आखिर में जो दिखाया जाता है, वह उम्मीद के मुताबिक नहीं लगता।
'दृश्यम 3' की खासियत क्या है?
इसकी सबसे बड़ी ताकत अब भी विजय सलगांवकर ही हैं। अजय देवगन की सधी हुई एक्टिंग कहानी को दिलचस्प बनाए रखती है, खासकर तब जब विजय एक बार फिर पुलिस से आगे निकल जाते हैं। फिल्म अपने दर्शकों को भी अच्छी तरह समझती है। पुरानी बातों का ज़िक्र, गायतोंडे के मज़ेदार पल और पिछली फिल्मों के संदर्भ फिल्म के अनुभव को और बेहतर बनाते हैं, और ये सब जरा भी बेमेल नहीं लगते। तब्बू, श्रिया सरन और इशिता दत्ता ने भी अपने किरदारों में इमोशनल गहराई लाई है।
वह सीन जिसमें दर्शकों को 'दृश्यम' की अहम चीज़ों जैसे '2 अक्टूबर', 'सत्संग', 'पाव भाजी' की याद दिलाई जाती है, वह पुरानी यादों को ताज़ा कर देता है। और यह काफी हद तक असरदार भी है। सबसे जरूरी बात यह है कि फिल्म विजय और उसके परिवार के एक साथ रहने की लड़ाई पर फोकस बनाए रखती है, जो 'दृश्यम' फ़्रैंचाइजी की जान है।
'दृश्यम 3' में क्या चीजें ठीक से काम नहीं करतीं?
सबसे बड़ी समस्या जयदीप अहलावत का किरदार है। उनके आने से काफी उत्साह बनता है, खासकर इसलिए क्योंकि उन्हें विजय के लिए एक मज़बूत नए विरोधी के तौर पर पेश किया गया है। लेकिन कहानी में उनके किरदार को उतनी गहराई नहीं दी गई है। किरदार की शुरुआत तो अच्छी होती है, लेकिन कहानी आगे बढ़ने के साथ-साथ उसका असर कम होता जाता है। आखिर में उनका किरदार उम्मीद के मुताबिक असरदार नहीं लगता, खासकर तब जब उसमें काफी संभावनाएं थीं।
हम खास तौर पर उस सीन का ज़िक्र करना चाहेंगे जहां विजय की सुनवाई वाले दिन जयदीप को एक इमरजेंसी प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए बुलाया जाता है। यह कहानी लिखने में लापरवाही जैसा लगा क्योंकि मेकर्स कोर्ट में तोमर की मौजूदगी को सही ढंग से नहीं दिखा पाए, और फिर भी वे हार गए, खासकर तब जब उन्होंने शुरू में दावा किया था कि इस बार उनकी जांच सबूतों पर आधारित है। कुछ हिस्से खींचे हुए भी लगते हैं, खासकर तब जब फिल्म आखिरी टकराव की ओर बढ़ रही होती है। रहस्य तो दिलचस्प बना रहता है, लेकिन उसका नतीजा हमेशा उस उम्मीद के बराबर नहीं होता जो फिल्म के पहले हिस्से में बनी थी।
क्या 'दृश्यम 3' का अंत दमदार है?
'दृश्यम 3' तब सबसे अच्छी लगती है जब यह विजय सलगांवकर पर ही फोकस रखती है। अजय देवगन इस फ़्रैंचाइज़ी का सबसे मज़बूत हिस्सा बने हुए हैं, और उनकी एक्टिंग फ़िल्म में इतना सस्पेंस और इमोशन बनाए रखती है कि दर्शक इससे जुड़े रहते हैं।
अगर आप इसे सिर्फ विजय के सफ़र के तौर पर देखें, तो यह फिल्म सही मायने में 3 रेटिंग की हकदार है। हालांकि, आखिरी चैप्टर होने के नाते इसमें और भी बहुत कुछ हो सकता था। जयदीप के किरदार में आखिरी लड़ाई को और भी रोमांचक बनाने की क्षमता थी, लेकिन कहानी में उनका पूरा इस्तेमाल नहीं किया गया। फिर भी, विजय के सफर का अंत काफी हद तक सही ढंग से होता है, भले ही यह फ़िल्म अपनी पिछली फिल्मों के स्तर तक न पहुंच पाए।







