हनुमान अंश के बहाने
सनातन धर्म में प्रथम पूज्य गणेश से लेकर महादेव, राम,कृष्ण, दुर्गा का मंदिर निर्माण की परंपरा आदिकालीन रही है।इनके अलावा अनेक हिन्दू देवी देवताओं के मंदिर देश दुनिया में है लेकिन सबसे अधिक मंदिर की संख्या को देखे तो हनुमान मंदिरों की संख्या करोड़ों में होगी। हर गली मोहल्ले में हनुमान का छोटा मंदिर तो दिख जाएगा। हनुमान, राम भक्त रहे उन्हें आदर्श सेवक के रूप में जाना जाता है। किवदंती के अनुसार कलयुग में अष्टचिरंजीवी व्यक्तित्व में बलि, परशुराम, मार्कण्डेय,व्यास, विभीषण,अश्वत्थामा, मार्कण्डेय के अलावा हनुमान का नाम लिया जाता है। माना जाता है कि हनुमान के एकनिष्ठ होने की वजह से राम का वरदान था कि भक्त परम्परा में हनुमान सदैव प्रथम रहेंगे। हिंदू धर्म में हनुमान रक्षक माने गए है, इस कारण वे सार्वजनिक रूप से मंदिर संख्या के आधार पर दुनिया के प्रथम पूज्य है। सनातन धर्म पर विश्वास करने वाले मानते है कि हनुमान जी उनके कष्ट का निवारण अन्य देवी देवताओं की तुलना में शीघ्र कर सकते है इस कारण हनुमान की सार्वजनिक पूजा सबसे अधिक होती है।सोचिए कि अगर हर शहर में एक ही हनुमान मंदिर होता तो भीड़ सम्हालना मुश्किल हो जाता।
हाल ही में "हनुमान अंश" नाम की एक फिल्म बनी है।मुख्यत: ये फिल्म नीम करौली वाले बाबा पर केंद्रित है।उन्हें हनुमान अंश के रूप में केंद्रित कर एक करोड़ चालीस लाख में ये फिल्म चित्रकूट में फिल्मांकित हुई है। शुरुवात में महज कुछ लाख रुपए का व्यवसाय करने वाली फिल्म ने आश्चर्यजनक रूप से दर्शकों को तो नहीं बल्कि भक्तों को अपनी ओर ऐसे खींचा कि शुरुवात में सिर्फ 250 स्क्रीन पर दिखने वाली फिल्म दो हजार स्क्रीन पर दिखाई जा रही है। अब तक ये फिल्म 236 करोड़ रुपए का व्यवसाय कर चुकी है।
हनुमान अंश को भक्तों ने धार्मिक फिल्म की श्रेणी में रखा है। व्यावसायिकता के दौर में "लोग जो चाहते है वो दो" के सिद्धांत पर कमाने वाली फिल्मे बनाए जाने की परंपरा है। इस कारण धार्मिक फिल्मे पचास साल पहले "जय संतोषी मां के सफलता के बावजूद धार्मिक फिल्मे बनना बंद हो चुका था
इक्का दुक्का फिल्मे बनी भी होगी तो उनकी असफलता ने बची खुची हिम्मत भी खत्म कर दिया।
मूक फिल्म बनने से पहले देश में मनोरंजन के लिए नाटक या कहे नौटंकी देखा दिखाया जाता था। मुंबई और कोलकाता में नाट्य संस्था प्रमुखता से थी। रामायण, महाभारत के अलावा पौराणिक कथाओं के पात्र का मंचन हुआ करता था। पृथ्वी राज कपूर खुद पृथ्वी थियेटर चलाया करते थे।
सनातन धर्म का तत्कालीन समय में कितना प्रभाव था कि देश की पहली मूक फिल्म "राजा हरिश्चन्द" दादा साहब फाल्के ने निर्मित किया था। दादा साहब फाल्के ने लंका दहन, कृष्ण जन्म, कालिया मर्दन जैसी धार्मिक फिल्मे बनाई। वक्त के साथ मनोरंजन के विषय बदलते गए। सामाजिक, सामयिक विषय के चलते धार्मिक फिल्मे भले ही कम हुई लेकिन शायद ही ऐसी कोई फिल्म नहीं बनी जिसमें सनातनी आस्था, विश्वास, रीति रिवाज को दिखाया न गया हो। अमिताभ बच्चन की फिल्म दीवार में भी अंत शिव मंदिर में होता है
धार्मिक फिल्मों में हनुमान अंश से पहले अगर किसी फिल्म ने सफलता के कीर्तिमान रचा तो वो "जय संतोषी मां" फिल्म थी।शोले के साथ प्रदर्शित इस फिल्म ने 1975 में पांच करोड़ रुपए(आज के हिसाब से 157 करोड़) कमाई थी। इस फिल्म के चलते सिनेमागृह मंदिर कहलाने लगे थे। दर्शक, जूता चप्पल उतार कर प्रवेश करते। इस फिल्म में शुक्रवार का विशेष महत्व हुआ करता था। गुड चना का प्रसाद वितरण हुआ करता था। जय संतोषी मां की सफलता के बावजूद धार्मिक फिल्मे बनाना निर्माताओं के लिए आकर्षण का केंद्र नहीं रहा। 1976 में सीता स्वयंवर और 2025 में एनिमेटेड फिल्म महावतार नरसिम्हा बनी थी।इस फिल्म ने भी 325 करोड़ रूपये की कमाई की थी।
देखा जाए तो दर्शकों के लिए धार्मिक फिल्मे भले ही सिल्वर स्क्रीन के लिए न बनती हो लेकिन छोटे पर्दे पर सनातन धर्म के देवी देवताओं सहित अनन्य भक्त पसंदीदा विषय है। रामानंद सागर ने रामायण, बी आर चोपड़ा ने महाभारत बनाकर घर घर के ड्राइंग रूम को धार्मिक स्थलों में बदल दिया था। महादेव पर बना धारावाहिक अत्यंत लोकप्रिय रहा था।
हनुमान अंश की सफलता के बावजूद ये मान लेना कि धार्मिक फिल्मो का तांता लग जाएगा बेमानी होगी।फिलहाल "हनुमान अंश" सफलता के नए कीर्तिमान रच रही है







