दादी और नानी के हाथों की बनी हुई खीर का ज़िक्र आते ही मुँह में पानी और दिल में बचपन की अनगिनत यादें ताज़ा हो जाती हैं। वह महज़ एक व्यंजन नहीं, बल्कि स्नेह, ममता और परंपरा का एक ऐसा अनमोल प्रसाद है जिसमें पीढ़ियों का प्यार घुला होता था। जब वे सोंधी खुशबू वाली खीर मिट्टी के सकोरों या पीतल की कटोरियों में परोसती थीं, तो उसमें एक अलग ही अपनापन होता था।
उस ज़माने में खीर बनाने की प्रक्रिया अपने आप में किसी उत्सव से कम नहीं थी। आधुनिक गैस चूल्हों की चकाचौंध से दूर, लकड़ी या उपलों की धीमी आँच पर मिट्टी के चूल्हे या भारी तले के पीतल के भगोने में जब दूध पकता था, तो उसकी सौंधी महक पूरे घर में फैल जाती थी। दादी-नानी के पास धैर्य की कोई कमी नहीं होती थी। वे घंटों धीमी आँच पर दूध को गाढ़ा करती थीं और लकड़ी के बड़े चम्मच से लगातार उसे चलाती रहती थीं, ताकि दूध बर्तन के तले में न लगे। इस धीमी पकाई के कारण ही दूध का प्राकृतिक मिठास और मावे जैसा सोंधापन उस खीर में उतर आता था, जो आज के प्रेशर कुकर या आधुनिक बर्तनों में कभी नहीं मिल सकता।
चावल चुनने से लेकर उसे घी में भूनने तक हर कदम पर उनका एक अनोखा अनुभव बोलता था। बासमती या छोटे दाने वाले सुगंधित चावल को पहले शुद्ध देशी घी में इलायची और थोड़े से मेवों के साथ हल्का सा भून लिया जाता था, जिससे खीर में सोंधेपन की खुशबू चार गुना बढ़ जाती थी। इसके बाद इसमें मखाने, चिरौंजी, बादाम और किशमिश का ऐसा सटीक संतुलन मिलाया जाता था कि हर एक चम्मच में स्वाद का अद्भुत विस्फोट होता था। चीनी की जगह अक्सर गुड़ या खांड का प्रयोग किया जाता था, जो सेहत के साथ-साथ स्वाद को और भी पारंपरिक और गहरा बना देता था।
आज के इस भागदौड़ भरे जीवन में भले ही हमारे पास हर आधुनिक सुख-सुविधा और रेडीमेड मिक्स्चर मौजूद हों, लेकिन वह स्वाद, वह धीमा संताप और वह निस्वार्थ प्रेम आज भी उन पुरानी यादों में ही जीवित है। दादी-नानी के हाथों की वह खीर सिर्फ पेट नहीं भरती थी, बल्कि वह बच्चों की जिद, बड़ों के दुलार और हर खास त्योहार की मिठास को अमर कर देती थी। वह स्वाद आज भी हमारी स्मृतियों के सबसे सुरक्षित और मधुर कोने में बसा हुआ है, जिसकी बराबरी दुनिया का कोई भी महंगे से महंगा शेफ नहीं कर सकता।







