नई दिल्ली, 03 जुलाई । देश के प्रमुख विपक्षी दलों ने शुक्रवार को एक साझा पत्र जारी कर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया और केंद्रीय जांच एजेंसियों के दुरुपयोग को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा।
कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी समेत इंडी गठबंधन के कई शीर्ष नेताओं के हस्ताक्षर वाले इस पत्र में चुनाव प्रणाली में पारदर्शिता की कमी और लोकतंत्र के भविष्य पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। विपक्षी नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की ओर से शुरू की गई एसआईआर प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। इसमें पश्चिम बंगाल का जिक्र करते हुए कहा कि राज्य में लॉजिकल विसंगतियों जैसी नई श्रेणियों के तहत करीब 27 लाख लोगों को वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया।
पत्र में आरोप लगाया गया कि मतदाता सूची से डुप्लीकेट और मृत मतदाताओं के नाम हटाने के बहाने बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम मनमाने ढंग से हटा दिए गए। इस संबंध में गठित 19 ट्रिब्यूनल में से एक ने पाया कि उनके सामने आए 1777 मामलों में से 1717 नाम (96 प्रतिशत) गलत तरीके से हटाए गए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि कि केंद्रीय एजेंसियों- सीबीआई, ईडी और एनआईए का इस्तेमाल केवल विपक्ष के नेताओं को निशाना बनाने तथा चुनी हुई सरकारों को गिराने या चुनावी नतीजों को प्रभावित करने के लिए किया जा रहा है।
संस्थाओं के कथित दमन पर चिंता जताते हुए विपक्षी नेताओं ने न्यायपालिका की भूमिका को रेखांकित करते हुए लिखा, "जब बाकी सब रास्ते बंद हो जाते हैं, तब भी लोग न्यायपालिका पर भरोसा करते हैं। जब हर व्यवस्था विफल हो जाती है तब हम अदालतों का रुख करते हैं लेकिन अगर यह भी विफल हो जाए तो हम किसके पास जाएं?"
विपक्षी नेताओं ने दावा करते हुए कहा कि एसआईआर एक ऐसी जटिल और अपारदर्शी प्रक्रिया है जिससे गरीब, अशिक्षित, दलित, आदिवासी और प्रवासी मजदूर वर्ग के लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं, क्योंकि उनके पास दस्तावेज जमा करने और फॉर्म भरने की क्षमता नहीं थी। विपक्ष ने फिर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की भूमिका पर सवाल उठाते हुए मांग की है कि जनता का भरोसा बहाल करने के लिए मतपत्रों को फिर से शुरू करने पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।
विपक्षी दलों ने मांग की कि आगामी एसआईआर प्रक्रियाओं को तुरंत रोका जाए और इसे केवल तभी लागू किया जाए जब अगले विधानसभा चुनाव में कम से कम 5 वर्ष का समय हो जिससे अधिकारी हर घर जाकर भौतिक सत्यापन कर सकें।
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