"लचीलापन और स्थिरता" विषय पर BRICS अकादमिक मध्य-अवधि सम्मेलन शुक्रवार को देहरादून में संपन्न हुआ। इस सम्मेलन में आठ देशों के 36 संस्थानों से 200 से अधिक प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया और हरित औद्योगिक परिवर्तन, जलवायु वित्त, जैव विविधता संरक्षण तथा भारत की 2026 की अध्यक्षता के तहत BRICS की भविष्य की भूमिका पर चर्चा की। इस सम्मेलन का आयोजन ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) द्वारा 'रिसर्च एंड इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर डेवलपिंग कंट्रीज' (RIS) और दून विश्वविद्यालय के साथ साझेदारी में किया गया था।
उद्घाटन सत्र में वक्ताओं ने इस बात पर ज़ोर दिया कि "BRICS केवल एक आर्थिक समूह नहीं है, बल्कि यह 'ग्लोबल साउथ' (वैश्विक दक्षिण) की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करने वाला एक मंच है, और यह कि स्थिरता निष्पक्ष और न्यायसंगत होनी चाहिए। 11 सदस्य देशों और 10 साझेदार देशों के साथ, जो दुनिया की लगभग आधी आबादी और वैश्विक GDP (PPP) के 40 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करते हैं, भारत की अध्यक्षता का विषय—'लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता का निर्माण'—एक 'मानवता-प्रथम' दृष्टिकोण अपनाता है, जो 'वसुधैव कुटुंबकम' की भावना के अनुरूप है।" उद्घाटन सत्र में उत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह PVSM, UYSM, AVSM, VSM (सेवानिवृत्त); उत्तराखंड के मुख्य सचिव आनंद बर्धन; BRICS के 'Sous Sherpa' और विदेश मंत्रालय (भारत सरकार) में संयुक्त सचिव (MER) शंभू एल. हक्की; दून विश्वविद्यालय की कुलपति सुरेखा डंगवाल; तथा ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के उपाध्यक्ष और BRICS थिंक टैंक्स काउंसिल (भारत) के कार्यकारी निदेशक हर्ष वी. पंत ने संबोधित किया।
इस कार्यक्रम का एक मुख्य आकर्षण 'केयरएज ग्रुप' (CareEdge Group) के प्रबंध निदेशक और समूह CEO मेहुल पांड्या का विशेष संबोधन था। उन्होंने ORF और केयरएज ग्रुप द्वारा संयुक्त रूप से प्रकाशित एक रिपोर्ट—"ब्रेकिंग कन्वेंशन: हाउ केयरएज ग्लोबल रेटिंग्स इज़ रीडिफाइनिंग ग्लोबल क्रेडिट रिस्क असेसमेंट" (Breaking Convention: How CareEdge Global Ratings is Redefining Global Credit Risk Assessment)—का विमोचन किया। इस रिपोर्ट में यह तर्क दिया गया है कि 'सॉवरेन क्रेडिट असेसमेंट फ्रेमवर्क' (संप्रभु ऋण मूल्यांकन ढांचा) को उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की वास्तविकताओं और उनके विकास पथों को बेहतर ढंग से प्रतिबिंबित करना चाहिए।
"एक खंडित वैश्विक अर्थव्यवस्था में हरित औद्योगिक परिवर्तन" विषय पर हुई चर्चा में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि हरित बदलावों से रोज़गार के अवसर पैदा होने चाहिए, MSME (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों) को समर्थन मिलना चाहिए और लोगों की आजीविका सुरक्षित रहनी चाहिए। वक्ताओं ने इस बात पर बल दिया कि बाहरी बाधाओं (external chokepoints) पर निर्भरता कम करने और लचीलेपन को बढ़ाने के लिए, संदर्भ-विशिष्ट समाधान और BRICS देशों के भीतर ही मज़बूत आपूर्ति श्रृंखलाओं का होना अत्यंत आवश्यक है। "जैव विविधता और स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों की सुरक्षा" पर हुए सत्र में वक्ताओं ने "यूरो-केंद्रित मॉडलों" से आगे बढ़ने का आह्वान किया और स्थानीय ज्ञान तथा पारंपरिक पारिस्थितिक प्रथाओं को अधिक मान्यता देने की वकालत की। प्रतिनिधियों ने ब्रिक्स (BRICS) देशों से आग्रह किया कि वे पर्यावरणीय कूटनीति के माध्यम से 'दक्षिण-दक्षिण सहयोग' को और गहरा करें और संरक्षण प्रयासों में स्वदेशी ज्ञान को अधिक मजबूती से शामिल करें।
"हरित बदलाव के लिए जलवायु वित्त को बढ़ाना" विषय पर हुई चर्चाओं में विशेषज्ञों ने तर्क दिया कि मुख्य मुद्दा वैश्विक पूंजी की कमी नहीं, बल्कि उसका असमान वितरण है। प्रतिभागियों ने मांग की कि जलवायु वित्त को विकास रणनीति के एक अभिन्न अंग के रूप में देखा जाए, और निवेश को जोखिम-मुक्त बनाने तथा कमजोर समुदायों तक वित्तपोषण की पहुंच बेहतर बनाने में बहुपक्षीय विकास बैंकों की भूमिका पर प्रकाश डाला। सम्मेलन का समापन "रचनात्मक आम सहमति: ब्रिक्स को पुनः केंद्र में लाने में भारत की भूमिका" शीर्षक वाली एक खुली चर्चा के साथ हुआ, जिसमें शंभू हक्की और हर्ष पंत ने भाग लिया। इस चर्चा का मुख्य केंद्र भारत का "वैश्विक जुड़ाव के प्रति मानवता-प्रथम और जन-केंद्रित दृष्टिकोण" था, जिसकी जड़ें "विश्वबंधु" (यानी दुनिया के मित्र) की भावना में निहित हैं। हक्की ने भारत के 'क्षमता-साझाकरण मॉडल' पर प्रकाश डाला, जिसका उद्देश्य 'वैक्सीन मैत्री', 'भारतीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग कार्यक्रम' (ITEC), 'डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर', 'अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन' और 'वैश्विक जैव ईंधन गठबंधन' जैसी पहलों के माध्यम से पारंपरिक 'दाता-प्राप्तकर्ता' ढांचों से आगे बढ़ना है। आयोजकों के अनुसार, सम्मेलन में विभिन्न क्षेत्रों पर हुई चर्चाओं से ऐसे नीति-प्रासंगिक सुझाव और विश्लेषणात्मक इनपुट प्राप्त हुए हैं, जो सितंबर में होने वाले आगामी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले होने वाली विचार-विमर्श प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण योगदान देंगे।







