विरुधुनगर, 21 मई । तमिलनाडु राज्य के विरुधुनगर जिले के मरैयूर में स्थित मसानम् स्वामी मंदिर में हर वर्ष आयोजित होने वाला उत्सव आज शुरू हाे गया। इस मंदिर के विशेष उत्सवों और पूजा में केवल पुरुष ही भाग लेते हैं पुरुषों के लिए ही आयोजित होने वाला अनोखा मंदिर उत्सव में भी शामिल होते हैं। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और इसे सामाजिक एकता का प्रतीक माना जाता है।
जिले के ग्रामीण इलाकों में आज भी कई पारंपरिक रीति-रिवाज पीढ़ियों से जीवित हैं। उन्हीं में से एक नरिकुडी के पास मरैयूर गांव में आयोजित होने वाला मासानम स्वामी मंदिर उत्सव है। यहां हर साल वैकासी महीने में आयोजित हाेने वाले यह उत्सव स्थानीय लोगों के बीच धार्मिक और सामाजिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह उत्सव अपनी अनोखी परंपरा के कारण लोगों का ध्यान आकर्षित करता है। इस मंदिर उत्सव की सबसे खास बात यह है कि कुछ विशेष धार्मिक अनुष्ठानों और उसके बाद होने वाले भोज में केवल पुरुषों को ही भाग लेने की अनुमति होती है। कई वर्षों से चली आ रही इस परंपरा का स्थानीय लोग सख्ती से पालन करते हैं।
स्थानीय मान्यता के अनुसार महिलाएं इस उत्सव में सीधे भाग नहीं लेतीं और न ही इस अवसर पर बने विशेष भोज काे भोजन घर ले जाने की भी अनुमति नहीं होती। इसे गांव की पुरानी आस्था और परंपरा का हिस्सा माना जाता है।
विशेष भोज बना आकर्षण
इस मंदिर में उत्सव के अवसर पर सुबह से ही बड़े पैमाने पर भोजन तैयार हाेना शुरू हाे गया। यहां विशालकाय बर्तनों में चावल और मांसाहारी व्यंजन पकाए गए तथा श्रद्धालुओं के लिए विशेष भोज की व्यवस्था की गई। मान्यता है कि उत्सव के अंतिम चरण में आयोजित सामूहिक भोज से ग्रामीणों के बीच उत्साह और एकजुटता की भावना को मजबूत हाेती है। विभिन्न क्षेत्रों से आए श्रद्धालुओं ने एक साथ बैठकर भोजन किया।
कई जिलों से पहुंचे श्रद्धालु
मरैयूर में आयोजित इस अनोखे उत्सव को देखने और इसमें भाग लेने के लिए आसपास के गांवों के अलावा कई अन्य जिलों से भी श्रद्धालु पहुंचे हैं।
विरुधुनगर के साथ-साथ मदुरै, रामनाथपुरम, शिवगंगा और तूथुकुड़ीसे भी लोग इस उत्सव में शामिल हुए। ग्रामीणों के अनुसार इस आयोजन से पूरे गांव में उत्सव जैसा माहौल बना रहा और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी कुछ हद तक लाभ पहुंचा। बदलाव के दाैर में भी कई गांवों में ये रीति-रिवाज अब भी सामाजिक विश्वास का हिस्सा बने हुए हैं। विशेष रूप से मंदिर उत्सव और उनसे जुड़ी परंपराएं स्थानीय लोगों की सांस्कृतिक पहचान मानी जाती हैं। मरैयूर का यह उत्सव भी परंपरा, आस्था और सामाजिक एकता का प्रतीक बनकर स्थानीय लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
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