जब 19 अप्रैल को
दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्युंग नई दिल्ली पहुँचे, तो यह दक्षिण कोरिया के किसी नेता की
आठ साल बाद हुई भारत में राजकीय यात्रा थी, इसके पूर्व राष्ट्रपति मून जे-इन ने 2018 में भारत की की थी। इन आठ वर्षों के
अंतराल में दोनों देशों ने कोविड महामारी, यूक्रेन संकट, ईरान युद्ध, वैश्विक आपूर्ति की चुनौतियां और एशिया
में उभरते नए भू-राजनीतिक बदलाव को देखा है. इसी का नतीजा है कि ये यात्रा संबंधों
में महज़ एक सामान्य नवीनीकरण के बजाय, भारत और दक्षिण कोरिया के बीच ‘रणनीतिक
सहयोग’’ का एक सोचा-समझा कदम बनाती है।
भारत–दक्षिण
कोरिया संबंधों की कूटनीतिक पृष्ठभूमि
इस यात्रा की कूटनीतिक पृष्ठभूमि कनाडा के कनानस्किस (जून 2025) में हुए जी-7 शिखर सम्मेलन से जुड़ी है, जहाँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और
राष्ट्रपति ली ने अपनी पहली द्विपक्षीय बैठक की थी और व्यापार, निवेश, प्रौद्योगिकी तथा जहाज़ निर्माण के
क्षेत्रों में सहयोग पर सहमति जताई थी। वे जोहान्सबर्ग (नवंबर 2025) में हुए जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान भी मिले थे, जहाँ मोदी ने व्यक्तिगत रूप से
राष्ट्रपति ली को भारत दौरे का निमंत्रण दिया था। इसके अलावा, सियोल (फरवरी 2026) में आयोजित छठे भारत-दक्षिण कोरिया
विदेश नीति और सुरक्षा संवाद (एफपीएसडी) ने इस दौरे के लिए एक आधार तैयार किया, जिससे दोनों देशों के द्विपक्षीय
संबंधों को और मजबूती मिली।
भारत–दक्षिण
कोरिया आर्थिक साझेदारी और रणनीतिक महत्व
भारत और दक्षिण कोरिया, दोनों ही दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं वाले मध्यम आकार के महत्वपूर्ण देश
हैं। भारत अब दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी और दक्षिण कोरिया बारहवीं सबसे बड़ी
अर्थव्यवस्था है, और दोनों
ही एक चुनौतीपूर्ण वैश्विक माहौल का सामना कर रहे हैं, जिस में आर्थिक संरक्षणवाद, व्यापार के हथियारीकरण और वैश्विक
शक्तियों की बढ़ती आक्रामकता एक प्रमुख मुद्दा है. दक्षिण कोरियाई प्रतिनिधिमंडल
की संरचना इस दौरे को विशिष्ट बनाती है। राष्ट्रपति ली 200 से अधिक लोगों के साथ भारत पहुंचे, जिनमें मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी और दक्षिण कोरिया के
सबसे महत्वपूर्ण औद्योगिक क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले कारोबारी नेता
शामिल थे। यह प्रतिनिधिमंडल केवल औपचारिकताओं (प्रोटोकॉल) के लिए जुटाया गया नहीं
लगता।
CEPA 2.0 के
तहत भारत–दक्षिण कोरिया व्यापार संतुलन और विस्तार की पहल
आर्थिक संदर्भ इस विशेष दौरे के पीछे के विशेष कारणों को स्पष्ट करते हैं। 2010 में हस्ताक्षरित व्यापक आर्थिक
भागीदारी समझौता (सीईपीए) ने व्यापार सहयोग तोड़ बढ़ाया,, लेकिन साथ ही व्यापार असंतुलन भी पैदा
किया है। अब दोनों पक्षों ने सीईपीए CEPA को नए सिरे से लागू करने पर सहमति बनते
हुए इसकी व्यापारिक असमानताओं को कम करने, दोनों देशों के लिए बाज़ार पहुँच का
विस्तार करने और इसे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला मॉडल की वास्तविकताओं के अनुरूप
बनाने का संकल्प लिया है। द्विपक्षीय व्यापार 2010 के 14 बिलियन डॉलर से बढ़कर 2025 में 27 बिलियन डॉलर हो गया है, जिसमें भारतीय आयात लगभग 18.5 बिलियन डॉलर है। भारत को उम्मीद है कि
सीईपीए 2.0, गैर-टैरिफ
बाधाओं को दूर करेगा, सेवाओं के
निर्यात को बढ़ावा देगा और व्यापार प्रवाह को भारत के आर्थिक हित में संतुलित
करेगा।
दोनों पक्षों ने 25 समझौतों
पर हस्ताक्षर किए हैं, जिनका मुख्य
उद्देश्य भारत से स्टील के निर्यात को बढ़ाना, एक नई ‘स्टील वार्ता’ (स्टील डायलॉग)
शुरू करना, कोरियाई
औद्योगिक टाउनशिप स्थापित करना और विमान-रोधी तोपों तथा मिसाइलों का संयुक्त
उत्पादन करना है। इन अतिरिक्त समझौतों में एआई अनुसंधान, विज्ञान और प्रौद्योगिकी शिक्षा, अंतरिक्ष अन्वेषण, डिजिटल भुगतान, खेल और सांस्कृतिक आदान-प्रदान शामिल
हैं।
भारत-कोरिया
व्यापार मंच और डिजिटल भुगतान सहयोग में नई संभावनाएँ
भारत मंडपम, नई दिल्ली
में आयोजित भारत-कोरिया व्यापार मंच ने उद्योग जगत के दिग्गजों को एक साथ लाकर, शिखर सम्मेलन की बातों को ठोस निवेश
प्रतिबद्धताओं में बदलने का काम किया। डिजिटल भुगतान इंटरऑपरेबिलिटी की पहल छोटे
और मध्यम उद्यमों के लिए वित्तीय प्रवाह को सुगम बना सकती है। यह उद्यम आमतौर पर
बड़े शिखर सम्मेलनों की घोषणाओं से सबसे अंत में लाभान्वित होते हैं, और द्विपक्षीय प्रगति के किसी भी
निष्पक्ष आकलन में विशेष ध्यान के हकदार हैं।
वित्तीय प्रवाह को सुव्यवस्थित करने और औद्योगिक संबंधों को मज़बूत बनाने
के लिए नए प्लेटफ़ॉर्म लॉन्च किए गए हैं। इसके तहत भारत-कोरिया फाइनेंशियल फ़ोरम
(आईकेएफएफ) की स्थापना की गई है और भारत तथा दक्षिण कोरिया के बीच एक औद्योगिक
सहयोग समिति का गठन किया गया है। इसका लक्ष्य 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 50 बिलियन डॉलर तक पहुँचाना है। दोनों
देशों ने अपने द्विपक्षीय आर्थिक जुड़ाव को बेहतर बनाने पर सहमति जताई है, जिसमें तकनीक, संसाधन और लंबी अवधि की आपूर्ति
श्रृंखला की स्थिरता पर विशेष ज़ोर दिया गया है।
सेमीकंडक्टर उद्योग में दोनों पक्षों के बीच सहयोग विशेष ध्यान का हकदार
है। भारत अपने ‘सेमीकंडक्टर मिशन 2.0’ के मध्य चरण में है, जिसे ₹76,000 करोड़ के प्रोत्साहन कार्यक्रम की
सहायता प्राप्त है। भारतीय सेमीकंडक्टर मिशन (आईएसएम) के लक्ष्यों को पूरा करने के
लिए भारत दक्षिण कोरिया से सक्रिय रूप से सहायता प्राप्त करने का प्रयास कर रहा
है। भारत-कोरिया डिजिटल ब्रिज (आईकेडीबी) एक सुव्यवस्थित संस्थागत चैनल है जो
सेमीकंडक्टर उद्योग में कोरियाई तकनीकी बढ़त के साथ हमारे विनिर्माण प्रोत्साहनों
को एकीकृत करने का काम करता है। ‘प्लस वन’ रणनीति के तहत, भारत दक्षिण कोरियाई सेमीकंडक्टर
कंपनियों के लिए लॉजिस्टिक्स सुविधाओं के साथ असेंबलिंग, टेस्टिंग, मार्किंग और पैकेजिंग केंद्र के रूप
में खुद को प्रस्तुत कर रहा है। यह प्रयास एकतरफा नहीं है, भारत जहां प्रौद्योगिकी और पूंजी की
तलाश कर रहा है, वहीं वह
दक्षिण कोरियाई कंपनियों को चीनी निर्यात पर निर्भरता कम करने और तकनीकी रूप से
कुशल मानव संसाधन उपलब्ध कराने के साथ-साथ बाजार विविधीकरण का अवसर भी प्रदान करता
है। भारत-कोरिया चिप कॉरिडोर ताइवान पर केंद्रित वैश्विक निर्भरता को भी कम करेगा.
भारत-दक्षिण
कोरिया समुद्री सहयोग और जहाज़ निर्माण साझेदारी
इसके अतिरिक्त, दक्षिण
कोरिया एलएनजी कैरियर, कंटेनर
जहाज़ और विशेष प्रकार के ऑफ़शोर प्लेटफ़ॉर्म बनाने में दुनिया में शीर्षस्थ है।
दोनों देशों के बीच अपनाए गए व्यापक ट्रेड फ़्रेमवर्क में, समुद्री लॉजिस्टिक्स, नए जहाज़ों का निर्माण करने के लिए
ग्रीनफ़ील्ड क्लस्टर बनाने, भारतीय
यार्ड को बेहतर बनाने और 400 जहाज़ों
के लिए 25 अरब डॉलर
की पाइपलाइन बनाने जैसी नई साझेदारियों पर ज़ोर दिया गया है। भारत में विशेषज्ञ की
कमी को दूर करने के लिए, दोनों देश
कोरिया इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी (केओआईसीए) के ज़रिए 10,000 भारतीय समुद्री इंजीनियरों को ट्रेनिंग
देने पर भी सहमत हुए हैं। भारत के लिए, कोरियाई पूँजी, सेमीकंडक्टर क्षेत्र में कोरियाई
विशेषज्ञता और समुद्री टेक्नोलॉजी, उसके ‘विकसित भारत 2047’ के विकास और सुरक्षा ढाँचे के लिए सीधे
तौर पर प्रासंगिक हैं। इस क्षेत्र में दोनों देशों के एक-दूसरे के अनुकूल हैं.
जहाज़ निर्माण उद्योग में, भारत एक
नया और उभरता हुआ घरेलू बाज़ार उपलब्ध कराता है, जबकि दक्षिण कोरिया तकनीक, प्रशिक्षण और वैश्विक प्रबंधकीय अनुभव
के मामले में हमारा सहयोगी बनेगा.
भारत-दक्षिण
कोरिया रणनीतिक दृष्टि और सभ्यतागत साझेदारी
शिखर सम्मेलन के समापन पर जारी भारत-दक्षिण कोरिया का संयुक्त रणनीतिक विज़न
document यह संकेत देता है कि दोनों सरकारें इस
संबंध को सभ्यतागत और रणनीतिक दृष्टिकोण से देखती हैं।प्रधानमंत्री मोदी के शब्दों
में, दोनों ही
देश लोकतांत्रिक मूल्यों, कानून के
शासन और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए एक स्थिर और साझा दृष्टिकोण के प्रति सहमत
हैं. रवींद्रनाथ
टैगोर ने कोरिया के लिए एक कविता लिखी थी – “पूरब का दीपक” Lamp of East. भारत और दक्षिण कोरिया ने मिलकर एक
दूरदर्शी मार्ग तैयार किया है, और आज दोनों ही एक-दूसरे के भरोसेमंद साझेदार के रूप में ‘पूरब के उदय’ की अभिव्यक्ति का एक उदाहरण है.







